बेसुर बचन... सभी को अप्रिय लगते हैं। लेकिन अप्रिय को प्रिय बनाना ही हमारा काम है। यों कहें कि अप्रिय ही हमें प्रिय लगता है। लोग कहते हैं बेसुर बचन बोलने ही क्यों? लेकिन सुरीले बचन हरेक को, हमेशा प्रिय लगें, इस बात की क्या गारंटी? हमने ठेका लिया है कि हम हर नक्कारखाने में बेसुर बचन ही बोलेंगे। भले ही वह तूती की तरह मद्धम हों।
ब्लॉगर्स की दुनिया में आपका स्वागत है...रास्ता कठिन है। लोग आपका लिखा पढ़ेंगे लेकिन प्रतिक्रिया नहीं देंगे। आपको कभी निराशा हो सकती है कि जब लोग पढ़ नहीं रहे हैं तो ऐसे लेखन से फायदा क्या...लेकिन इससे हताश होने की जरूरत नहीं है। आप लिखिए...कारवां खुदबखुद बनता जाएगा...
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