Friday, September 5, 2014

हमें हिंदी नहीं आती

टीचर्स डे पर मोदी जी का बच्चों से इंट्रैक्शन सफल रहा। सारी जनता खुश है और अपने प्रधानमंत्री का गुणगान कर रही है। मोदी जी के हिंदी प्रेम से सभी गदगद हैं। यह हमारे लिए गर्व की बात है। हिंदी हमारी अपनी भाषा है जिसका प्रयोग हमें हर जगह करना चाहिए। इधर यह भी खबर है कि प्रधानमंत्री के इंट्रैक्शन का लाभ दक्षिण के बहुत से स्कूलों के बच्चे नहीं उठा पाए। ऐसा नहीं है कि उनके पास टीवी या केबल कनेक्शन नहीं था। उनके पास हिंदी का ज्ञान नहीं था। अब इसे उन बच्चों का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि वे इतनी गंभीर चर्चा का आनंद नहीं उठा पाए!!

यह तो रही दक्षिण की बात, लेकिन इस देश का प्रतिनिधित्व करने वालों को सिर्फ दक्षिण की भाषाओं का ही खयाल नहीं रखना चाहिए। देश में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिन्हें हिंदी भाषा का कोई ज्ञान नहीं और यह उनका अपराध नहीं। हमारे देश के संविधान में ऐसी अनेक भाषाओं का जिक्र है जिन्हें हम लिंग्विस्टिक माइनॉरिटी यानी भाषाई अल्पसंख्यक कहते हैं। हाल ही में कमीशन फॉर लिंग्विस्टिक माइनॉरिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हमें विभिन्न राज्यों में बसने वाले भाषाई अल्पसंख्यकों पर भी ध्यान देना चाहिए। रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि अधिकतर राज्यों में राज्य की आधिकारिक भाषा को सीखना अनिवार्य है लेकिन भाषाई अल्पसंख्यकों की अपनी मातृभाषा को संरक्षित करने का कोई प्रावधान नहीं है।

मोदी जी के अपने गुजरात में गुजराती भाषा के बाद सबसे ज्यादा भीली या भिलोंदी बोली जाती है। भीली बोलने वाले वहां 4.75 परसेंट हैं तो हिंदी बोलने वाले 4.71 परसेंट। जम्मू और कश्मीर में कश्मीरी भाषा के बाद लोग सबसे ज्यादा डोगरी (21.74 परसेंट) बोलते हैं, हिंदी (18.44 परसेंट) नहीं। आंध्र प्रदेश में हिंदी बोलने वाले सिर्फ 3.23 परसेंट हैं, जबकि पुदुचेरी और लक्षद्वीप में तो हिंदी बोली ही नहीं जाती। नॉर्थ ईस्ट के सातों राज्यों में हिंदी बोलने वालों का प्रतिशत 1.14 से 7.39 परसेंट ही है। भाषाई अल्पसंख्यक जिन भाषाओं को बोलते हैं, उनमें से बहुत सी भाषाओं का तो नाम भी ज्यादातर लोगों ने सुना नहीं होगा, जैसे हलाबी, कुरुख, मुंडारी, हो, निस्सी, आदि, हमार, थाडो, राभा, कोच, लाखेर, पाचुरी, खारिया, इसके अलावा भी बहुत सी।

जिस तरह भाषाई अल्पसंख्यकों को एक भाषा की छड़ी से नहीं हांका जा सकता, उसी तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों पर भी एक कायदा लागू नहीं होता। उसके जमावड़े से किसी को कोई खतरा नहीं होता। अनेकता में एकता हमारा नारा रहा है, और हमें उसी को आगे बढ़ाना चाहते हैं। पेड़ की हर पत्ती दूसरी से अलग है और यही उसकी सुंदरता है।

Tuesday, September 2, 2014

हम सब नस्लवादी हैं


योगी आदित्यनाथ ने बड़ी आसानी से एक बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में मुसलिम आबादी 10 प्रतिशत से ज्यादा होती है, वहां दंगे होते हैं। योगी आदित्यनाथ भाजपा के सांसद हैं। सार्वजनिक मंच पर ऐसे बयान देकर उन्होंने साबित किया है कि किसी एक समुदाय के प्रति हमारा रवैया क्या है। हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जो गाहे-बगाहे इस तरह के बयान देते रहते हैं। इससे पहले मुंबई हाईकोर्ट ने भी ऐसा ही खुलासा किया था। कोर्ट ने कहा था कि महाराष्ट्र में पुलिस हिरासत में मरने वाले लोगों में ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग होते हैं। यह कोई नई बात नहीं। भेदभाव करना हमारी प्रवृति है और प्रकृति भी। दिलचस्प बात यह है कि हम इसके प्रति कभी शर्मिंदा होते।
अपने किए पर शर्मिंदा होना हमने नहीं सीखा। हमने तो गर्व करना सीखा है। अपने धर्म पर, अपनी जाति पर। कई बार अपने रंग पर भी। संविधान ने भले ही हम सब को बराबरी का दर्जा दिया है लेकिन हम किसी लिखित निर्देश को नहीं मानते। हमारे लिए यही लोकतंत्र है और यही हमारी आजादी। हम खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझेंगे। भेदभाव करेंगे और उस पर शर्मिंदा नहीं होंगे।
पर यह भेदभाव तब तक नहीं होता जब तक हमें दूसरे का धर्म, जाति या नाम नहीं पता होता। तब तक हम आर्थिक या सामाजिक स्थिति देखकर उसके साथ व्यवहार करते हैं। मालदार है। कपड़े- लत्ते अच्छे पहने हैं। नई चमचमाती कार में चलता है। अंग्रेजी बोलता है। किसी बड़े दफ्तर में काम करता है। यह सब देखकर उसके साथ व्यवहार किया जाता है। लेकिन उसके धर्म, जाति या नाम का पता चलते ही कुछ तो बदल जाता है।   
दिल्ली में घर काम करने वाली ज्यादातर बाइयां बंगाली हैं। उनमें से बहुत सी बांग्लादेशी हैं पर उनकी राष्ट्रीय और धार्मिक पहचान बदल चुकी है। मांग में मोटा सिंदूर लगाकर, कलाई में शंखा-पोला पहनकर उनमें से ज्यादातर खुद को हिंदू साबित करने की कोशिश करती हैं। हमारी सोसाइटी की एक भाभीजी ने जोर देकर कहा था कि हमारी घर काम करने वाली बाई हिंदू ही है। मुसलमान होती तो शक्ल से ही पता चल जाता। क्या सचमुच शक्ल से किसी के धर्म या जाति का पता चलता है। बाद में पता चला कि बाई सचमुच मुसलमान थी। एक बार बाई बीमारी के चलते चार-पांच दिन काम पर नहीं आई तो भाभीजी ने उसकी ढूंढ तलाश की। घर पहुंची तो देखा कि बाई के घर पर कुरान रखी थी और दीवार पर मक्का-मदीना का फोटो टंगा था। भाभी जी सन्न रह गईं। पहले-पहल तो सोचा कि झूठ बोलने के कारण बाई को काम से हटा दें लेकिन फिर सोचा, बाई काम तो सलीके से करती है। लेकिन उस दिन से बाई के प्रति उनका रवैया बदल गया। पहले उससे चाय वगैरह बनवा लेती थीं। कभी-कभी तबीयत खराब होने पर रोटी भी बनवा लेती थीं। वह भी बिना कुछ दिए लिए। लेकिन फिर वह सब छोड़ दिया। बाई भी बेगारी से बच गई। हां, बाई के लिए किचन में पहले भी चाय का गिलास और प्लेट अलग रखे रहते थे। अब भी वैसा ही है। बाई आपके किचन में आपके गिलास और प्लेट में खाना कैसे खा सकती है? हमारे एक रिश्तेदार तो सस्ती और खुली बिकने वाली चाय की पत्ती खरीदकर लाते थे। सिर्फ इसलिए क्योंकि घर काम करने वाली बाई, कूड़ा उठाने वाली माई या कारपेंटर को चाय पिलानी पड़ती है।
वैसे भेदभाव करना सिर्फ हमारे समाज का सच नहीं। पश्चिम भी इससे अछूता नहीं। पूरे इराक में उठा-पटक मची है तो उसके मूल में भी यही द्वंद्व है। हर धार्मिक समूह में एक वर्ग खुद को दूसरों से बेहतर समझता है। वह कभी शब्दों के हथियार चलाता है, कभी असली। लेकिन असली हथियार उठाने वालों से ज्यादा खतरनाक हैं शब्दों के हथियार चलाने वाले। पिछले दिनों न्यूयॉर्क टाइम्स में निकोलस क्रिस्टॉफ का लेख छपा था। क्रिस्टॉफ का कहना था कि समाज को उन लोगों से ज्यादा खतरा है जो खुद को समतावादी मानते हैं। क्रिस्टॉफ मानते हैं कि हम सभी कहीं न कहीं नस्लवादी हैं। भेदभाव करने की प्रवृति हमारे मन की परतों में दबी हुई है। क्रिस्टॉफ ने अपने लेख में कई सर्वेक्षणों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि अमेरिका में डॉक्टर्स दूसरे मरीजों के मुकाबले ब्लैक या हिस्पैनिक मरीजों को पेनकिलर दवाएं कम देते हैं। स्कूल प्रशासन व्हाइट स्टूडेंट्स के मुकाबले ब्लैक स्टूडेंट्स को तीन गुना अधिक सस्पेंड करते हैं। मारिजुआना रखने वाले ब्लैक्स को पुलिस 3.7 गुना अधिक गिरफ्तार करती है, जबकि मारिजुआना रखने वाले ब्लैक्स और व्हाइट्स की संख्या लगभग बराबर है। नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च ने तो यहां तक कहा है कि ब्लैक लोगों के मुकाबले व्हाइट लोगों को नौकरियों आसानी से मिल जाती हैं। 

यह सर्वे अमेरिका में किए गए तो सच का खुलासा हुआ। हमारे यहां ऐसे सर्वे नहीं किए जाते। हम मानते हैं कि हम महान समतावादी-समाजवादी हैं। हमें किसी सर्वे की जरूरत नहीं। इसलिए असलियत सामने नहीं आती। लेकिन असलियत जुबान पर आ ही जाती है। लव जेहाद पर आयोजित एक टीवी कार्यक्रम में भाजपा के एक सम्मानित प्रवक्ता ने कहा था, हमारी बेटियां इतनी भोली हैं कि वे मुसलमान लड़कों के बहलावे में आ जाती हैं। पर हमें ऐसे संस्कार देने चाहिए कि वे ऐसा करें ही नहीं। यह बात अनायास ही फूटी थी- बिना सोचे-समझे। सोच-समझकर कही जाने वाली बात से पलटा जा सकता है। लेकिन अनायास कही हुई बात भीतर से निकलती है और भीतर की असलियत खोलकर रख देती है।