योगी आदित्यनाथ ने बड़ी आसानी से एक बयान दे दिया। उन्होंने
कहा कि जिन इलाकों में मुसलिम आबादी 10 प्रतिशत से ज्यादा होती है, वहां दंगे होते
हैं। योगी आदित्यनाथ भाजपा के सांसद हैं। सार्वजनिक मंच पर ऐसे बयान देकर उन्होंने
साबित किया है कि किसी एक समुदाय के प्रति हमारा रवैया क्या है। हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जो गाहे-बगाहे इस तरह के बयान देते रहते हैं। इससे पहले मुंबई
हाईकोर्ट ने भी ऐसा ही खुलासा किया था। कोर्ट ने कहा था कि महाराष्ट्र में पुलिस
हिरासत में मरने वाले लोगों में ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग होते हैं। यह
कोई नई बात नहीं। भेदभाव करना हमारी प्रवृति है और प्रकृति भी। दिलचस्प बात यह है
कि हम इसके प्रति कभी शर्मिंदा होते।
अपने किए पर शर्मिंदा होना हमने नहीं सीखा। हमने तो गर्व करना
सीखा है। अपने धर्म पर, अपनी जाति पर। कई बार अपने रंग पर भी। संविधान ने भले ही
हम सब को बराबरी का दर्जा दिया है लेकिन हम किसी लिखित निर्देश को नहीं मानते। हमारे
लिए यही लोकतंत्र है और यही हमारी आजादी। हम खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझेंगे।
भेदभाव करेंगे और उस पर शर्मिंदा नहीं होंगे।
पर यह भेदभाव तब तक नहीं होता जब तक हमें दूसरे का धर्म, जाति
या नाम नहीं पता होता। तब तक हम आर्थिक या सामाजिक स्थिति देखकर उसके साथ व्यवहार
करते हैं। मालदार है। कपड़े- लत्ते अच्छे पहने हैं। नई चमचमाती कार में चलता है। अंग्रेजी
बोलता है। किसी बड़े दफ्तर में काम करता है। यह सब देखकर उसके साथ व्यवहार किया
जाता है। लेकिन उसके धर्म, जाति या नाम का पता चलते ही ‘कुछ
तो’ बदल जाता है।
दिल्ली में घर काम करने वाली ज्यादातर बाइयां बंगाली हैं।
उनमें से बहुत सी बांग्लादेशी हैं पर उनकी राष्ट्रीय और धार्मिक पहचान बदल चुकी
है। मांग में मोटा सिंदूर लगाकर, कलाई में शंखा-पोला पहनकर उनमें से ज्यादातर खुद
को हिंदू साबित करने की कोशिश करती हैं। हमारी सोसाइटी की एक भाभीजी ने जोर देकर
कहा था कि ‘हमारी घर काम करने वाली बाई हिंदू ही
है। मुसलमान होती तो शक्ल से ही पता चल जाता।‘ क्या सचमुच शक्ल से किसी के धर्म या
जाति का पता चलता है। बाद में पता चला कि बाई सचमुच मुसलमान थी। एक बार बाई बीमारी
के चलते चार-पांच दिन काम पर नहीं आई तो भाभीजी ने उसकी ढूंढ तलाश की। घर पहुंची
तो देखा कि बाई के घर पर कुरान रखी थी और दीवार पर मक्का-मदीना का फोटो टंगा था।
भाभी जी सन्न रह गईं। पहले-पहल तो सोचा कि झूठ बोलने के कारण बाई को काम से हटा
दें लेकिन फिर सोचा, बाई काम तो सलीके से करती है। लेकिन उस दिन से बाई के प्रति
उनका रवैया बदल गया। पहले उससे चाय वगैरह बनवा लेती थीं। कभी-कभी तबीयत खराब होने
पर रोटी भी बनवा लेती थीं। वह भी बिना कुछ दिए लिए। लेकिन फिर वह सब छोड़ दिया। बाई
भी बेगारी से बच गई। हां, बाई के लिए किचन में पहले भी चाय का गिलास और प्लेट अलग
रखे रहते थे। अब भी वैसा ही है। बाई आपके किचन में आपके गिलास और
प्लेट में खाना कैसे खा सकती है? हमारे एक रिश्तेदार तो सस्ती और खुली
बिकने वाली चाय की पत्ती खरीदकर लाते थे। सिर्फ इसलिए क्योंकि घर काम करने वाली
बाई, कूड़ा उठाने वाली माई या कारपेंटर को चाय पिलानी पड़ती है।
वैसे भेदभाव करना सिर्फ हमारे समाज का सच नहीं। पश्चिम भी
इससे अछूता नहीं। पूरे इराक में उठा-पटक मची है तो उसके मूल में भी यही द्वंद्व
है। हर धार्मिक समूह में एक वर्ग खुद को दूसरों से बेहतर समझता है। वह कभी शब्दों
के हथियार चलाता है, कभी असली। लेकिन असली हथियार उठाने वालों से ज्यादा खतरनाक
हैं शब्दों के हथियार चलाने वाले। पिछले दिनों न्यूयॉर्क टाइम्स में निकोलस
क्रिस्टॉफ का लेख छपा था। क्रिस्टॉफ का कहना था कि समाज को उन लोगों से ज्यादा खतरा
है जो खुद को समतावादी मानते हैं। क्रिस्टॉफ मानते हैं कि हम सभी कहीं न कहीं
नस्लवादी हैं। भेदभाव करने की प्रवृति हमारे मन की परतों में दबी हुई है। क्रिस्टॉफ
ने अपने लेख में कई सर्वेक्षणों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि अमेरिका में डॉक्टर्स
दूसरे मरीजों के मुकाबले ब्लैक या हिस्पैनिक मरीजों को पेनकिलर दवाएं कम देते हैं।
स्कूल प्रशासन व्हाइट स्टूडेंट्स के मुकाबले ब्लैक स्टूडेंट्स को तीन गुना अधिक सस्पेंड
करते हैं। मारिजुआना रखने वाले ब्लैक्स को पुलिस 3.7 गुना अधिक गिरफ्तार करती है,
जबकि मारिजुआना रखने वाले ब्लैक्स और व्हाइट्स की संख्या लगभग बराबर है। नेशनल
ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च ने तो यहां तक कहा है कि ब्लैक लोगों के मुकाबले व्हाइट
लोगों को नौकरियों आसानी से मिल जाती हैं।
यह सर्वे अमेरिका में किए गए तो सच का
खुलासा हुआ। हमारे यहां ऐसे सर्वे नहीं किए जाते। हम मानते हैं कि हम महान समतावादी-समाजवादी
हैं। हमें किसी सर्वे की जरूरत नहीं। इसलिए असलियत सामने नहीं आती। लेकिन असलियत
जुबान पर आ ही जाती है। लव जेहाद पर आयोजित एक टीवी कार्यक्रम में भाजपा के एक
सम्मानित प्रवक्ता ने कहा था, हमारी बेटियां इतनी भोली हैं कि वे मुसलमान लड़कों
के बहलावे में आ जाती हैं। पर हमें ऐसे संस्कार देने चाहिए कि वे ऐसा करें ही
नहीं। यह बात अनायास ही फूटी थी- बिना सोचे-समझे। सोच-समझकर कही जाने वाली बात से
पलटा जा सकता है। लेकिन अनायास कही हुई बात भीतर से निकलती है और भीतर की असलियत
खोलकर रख देती है।